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~”স্যার! সংসারে গন্ডগোল লেগে যাবে, একটা দিন ছুটি চাই।”

~”স্যার! অন্তত ঈদের দিনটা ছুটি দেন।”
~”স্যার! সংসারে গন্ডগোল লেগে যাবে, একটা দিন ছুটি চাই।”
~”স্যার! বাচ্চাদের পরীক্ষা শেষ, স্কুল বন্ধ। ওরা দুইটা দিন আমার সাথে থাকতে চায়। পুরোটা মাস কাজ করছি।”
~”স্যার! কোরবানির দিনের দায়িত্ব থেকে তো কেউ ছাড় দেবে না। তাই সকাল বেলাটা আসাটা কঠিন।”
~”স্যার আউটডোরে এক‌দিন দেড়শ রোগী দেখে, মাথা ঘুরে পড়ে গিয়েছিলাম। শে পর্যন্ত বমি করে হালকা হয়েছে। মাথায় পানি দিয়ে এসে আবার চেয়ারে বসছি।”

আমার হাসপাতালে কর্তৃপক্ষের রুমে গত এক সপ্তাহে যে কয়বার যাওয়ার সুযোগ হয়েছে, প্রায় প্রতিটা মুহূর্তে ঈদের ছুটি নিয়ে চিকিৎসকদের এ ধরনের আলাপন প্রত্যক্ষ করেছি।

বিশ্বাস করুন, একজনেরও চোখে মুখে মলিনতা, বিষন্নতা, বিরক্তির ভাব দেখিনি। আবেগে ভারী হয়ে যাওয়া কন্ঠে শুধু ছিল অনুরোধের সুর। কারণ তারা সবাই জানেন, এই ভয়াল পরিবেশে তারা লম্বা ছুটি নিলে সেটি বিবেকের বিরুদ্ধে যাবে। ভাবুন তো, ঘরে পরিবারের সকল সদস্যদের রেখে একজন নারী চিকিৎসক হাসপাতলে রাত কাটাচ্ছেন, যিনি কারো স্ত্রী, মা কিংবা সন্তান। প্রত্যেকেরই স্পাউস, পিতা মাতা, সন্তান রয়েছে। টানা একটি মাস হাজার হাজার রোগীকে ক্লান্তিহীন সার্ভিস দিয়েও তারা উৎসব করতে পারছেন না। অথচ যাদের জন্য করছেন তারা কেউই আপন, পরিজন বা আত্মীয় নন। টানা ডিউটিতে, ডাক্তার, নার্স, ওয়ার্ডবয়, কর্মচারীদের চোখের নিচে অনেকেরই কালি পড়ে গেছে। 
এ দৃশ্য আমি প্রতিদিনই দেখি।

একটা আনন্দ #উৎসব
#বিশ্রামের উপলক্ষ, প্রাপ্য #অধিকার। 
কিন্তু সেটি তারা ভোগ করতে পারছেন না।

যে সময়টিতে আপনি পরিবার পরিজন নিয়ে ঈদ করছেন, কর্মব্যস্ত সময় কাটানোর পরে কয়েকটা দিন লম্বা ঘুমের প্ল্যান করছেন, ঠিক সেই সময়ে হাজারো চিকিৎসক রোস্টার অনুযায়ী হাসপাতালে সার্ভিস দিচ্ছেন। প্যাথলজি ল্যাব এ রিপোর্ট লিখছেন। এক্সরে আলট্রাসনো করছেন।

ভয়াল যে সময়টিতে আপনি সতত মৃত্যু আতঙ্কে ভুগছেন। ঘরের সবকটি জানালায় নেট লাগাচ্ছেন। সকাল-বিকাল স্প্রে করছেন, শত শত টাকা খরচ করে ক্রিম মাখছেন, ছুটিতে লক্ষ-কোটি ডেঙ্গু মশা কবলিত রাজধানী থেকে বের হয়ে গ্রামে গিয়ে ডেঙ্গু মুক্ত পরিবেশে ঈদ করছেন। বিপরীতে এমনতর পরিবেশে চিকিৎসকরা জীবনের ঝুঁকি নিয়ে ডেঙ্গু রোগীদের মাঝেই অবস্থান করছেন।
চোখ বুজে একবার ভাবুন তো, 
কতখানি ভয়াবহ এ দৃশ্যপট?
কতখানি ঝুঁকিপূর্ণ এ দায়িত্ব পালন?
৬ জন সহকর্মীকে হারিয়েছেন, তারপরও ভয়হীন? 
কেন জানেন?
দিন শেষে আমরা সবাই এ মাটির মানুষ।
একই রক্তে মাংসে গড়া একই দেহ, একই প্রাণ। তাই
ভালোবাসা, দায়িত্ববোধ আর মমত্ববোধ নিয়েই ক্লান্তিহীন নির্ঘুম এ দায়িত্ব পালন। অন্য দেশের চিকিৎসকরা আপনাকে বেশি ভালবাসবে, এ ভাবনাটাই যে অমূলক।

আপনার পরিচিত কোন চিকিৎসক,নার্স থাকলে এটলিস্ট তাকে ফোন দিয়ে একটু খোঁজ নিন।

আপনার পাশের হাসপাতালের দায়িত্বরত থাকলে ঘরের রান্না করা খাবার নিয়ে, কাছে গিয়ে একটু শুভাশিস জানান।

ছোট্ট করে বলুন না;
আপনার কষ্টের বিনিময়ে, আপনার জন্য ভালোবাসা। 
আপনার জন্য দোয়া, যাতে আপনি সুস্থ থাকেন।

জাস্ট এতোটুকুই। 
দুরত্ব যতই হোক, আপনজনের কাছেই থাকুন।

সুস্থতা আর ভালোবাসার বন্ধনে গড়ে তুলি আমাদের প্রতিটি আঙ্গিনা। নিরাপদে কাটুক প্রতিটি উৎসব।
সবার জন্য নিরন্তর ভালোবাসা “ঈদ মোবারক”।।

ডা. মুহিব্বুর রহমান রাফে 
কনসালটেন্ট, 
ফিজিক্যাল মেডিসিন এন্ড রিহ্যাবিলিটেশন

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